आज बात उन पशुओं की जो केवल इसलिए सलाखों में कैद हैं जिससे कि दुनिया का सबसे खतरनाक पशु उनका दीदार कर सके। भई दीदार भी मुफ्त में थोड़े ही, पैसे देकर करते हैं। सही पहचाना यहां बात हो रही है चिड़ियाघर की। खाली समय में मैं भी जंगली पशुओं के दर्शन के लिए चला गया। सोचा था बचपन में किताब में जैसा पढ़ा था चिड़ियाघर वैसा ही होगा। मैं भी बन्दरों को मूंगफलिया खिलाऊंगा, लेकिन टिकट लेते समय बार-बार हो रही एक घोषणा ने मेरे अरमानों को पहला धक्का दिया। ठीक सोचा आपने, यही कहा जा रहा था कि कुछ भी खाने पीने का सामान अन्दर ले जाना सख़्त मना है। ख़ैर मुझे खुशी भी थी कि इस ज़माने में आम इंसानों की बात न करें तो पशुओं को तो सुरक्षा मुहैया करवा ही दी जाती है। लेकिन इस खुशी के बावजूद टिकट की इतनी लम्बी लाइन ने मेरे उत्साह को हल्का ठण्डा कर दिया।
जैसे-तैसे चिड़ियाघर के अन्दर प्रवेश हुआ, एक अजीब-सा सुरूर था जानवरों को देख लेने का। मेरे कदम जल्दी-जल्दी वहां बने कई पिंजरों की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन पिंजरों में कैद रंगबिरंगी तोते, बाज, चील और लंगूर बड़ी शान्ति के साथ बैठे हुए थे, मानो उनकी ज़िन्दगी बेरंग हो गई हो, कोई जोश ही न हो। हम सभी पक्षियों को उनके उतावलेपन, चहचहाहट और चंचल व्यवहार से जानते हैं, लेकिन उन पिंजरों में बंद पक्षी जैसे अपनी बेबसी से मायूस हो चुके थे।
वहीं कई जानवर तो दर्शकों के दर्शन से ऊब कर पिंजरे में बने अपने घर में ही चुपचाप बैठे थे। लेकिन इतनी सी बात से किसी विषय पर अपनी राय बना लेना ठीक नहीं था। इसलिए मैंने अपनी नज़रों को सामने और कदमों को आगे बढ़ाया।
शेर को देखने की ललक में मैंने पूरा 'सूनाघर’ माफ कीजियेगा चिड़ियाघर छान मारा। अन्ततोगत्वा शेर मेरे सामने, मेरा मतलब है मैं शेर के सामने था,लेकिन जंगल का ये राजा कैसे इंसान का बन्धक बन कर जी रहा था ये या तो वह जानता था या ईश्वर। पहली बार किसी राजा को मैंने अजीब सी उलझन में देखा। वहां खड़े दर्शक शेर को सामने से देखने का मज़ा ले रहे थे और वह आदमखोर इंसानों को देख अन्दर ही अन्दर कसमसा रहा था। मानो कह रहा हो कि ‘एक बार पिंजरा खोल दो फिर दिखाऊंगा असली पिक्चर’।
अपने इस कई प्रश्न खड़े कर देने वाले कारवां को मैं ख़त्म कर वापस उस ‘मुर्दाघर’ माफ कीजियेगा चिड़ियाघर से बाहर निकलने लगा, तभी बाहर निकलने से पहले खान-पान का एक स्टाल देख मेरे दुख ने क्रोध का रूप ले लिया ,क्योंकि कुछ ही देर पहले मैंने एक घोषणा सुनी थी ,शायद आपने ऊपर पढ़ी हो, लेकिन जो अपने क्रोध पर काबू कर ले वही ‘हैवान’ मेरा मतलब है इंसान कहलाता है, इसलिए उन जानवरों को उनके मुकद्दर पर छोड़कर, मैं सिकंदर बनकर चुकंदर खाता हुआ दो पंक्तियां मन में लिए जालंधर मेरा मतलब है ग़ाज़ियाबाद की ओर रवाना हो गया। जाते-जाते वह दो पंक्तियां आपके समक्ष ज़रूर प्रस्तुत करने की सोच है कि-
“कैद में रहने की आदत तो हमने भी कभी नहीं पाली,
वर्ना ऐ इंसानों फ़र्क बस मुकद्दर का ही समझो...”
... अनुराग वर्मा
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