Sunday, January 22, 2012

ये कैसे विचार हैं ?

अब हिम्मत के सामने ये शरीर थकने लगा है
हार न मानने की फितरत खत्म होने को है
आंखों में नींद लेकर जाना चाहता हूं घर पर
रास्ते में आंख झपकना खतरा मालूम होता है
बुद्धि पता नहीं कब तक साथ दे
आखिरी हथियार न जाने कब साथ छोड़ दे
सोच-विचार करने की जिम्मेदारी से मुक्त करो मुझे
किस नगर किस डगर किस पहर कहां जाउं
बंधी सी मालूम होती है ये ज़िन्दगी
हंसना अब ऊपरी दिखावा ही रह गया है
दिल से हंसना अभी सीखना बाकी है
मतलब समझना ही जरूरी नहीं किसी बात का
जाने दिया जाए तो फ़ायदे में रहने की आदत डाल लो...

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