Thursday, May 6, 2010

देर है,अंधेर नहीं

जिस तरह से २६/११ के मुंबई हमले को याद करके भारत थर्रा उठता है उसी तरह ६/५ को अजमल कसब को फांसी की सजा देकर भारत ने तमाम आतंकी सगठनों को दिखा दिया की देर से ही सही लेकिन भारत की तरफ नज़र उठाने का क्या हश्र होता है.मुंबई कोर्ट का यह फैसला भारतीय इतिहास के पन्नों पर दर्ज होगा क्योंकि मुजरिम के तमाम बहकावों और नौटंकियों के बाद भी उसे उसके किये गए जुर्म की सटीक सजा सुनाई गई.यदि ये सजा फांसी की न होती तो उन तमाम निरदोषों की आत्मा को जिनकी जान इस आतंकी ने बेदर्दी से ली थी,कभी शांति न मिलती.कुछ भी हो अब प्रत्येक वर्ष ६/५ का दिन कसाब जैसे कई आतंकियों के पसीने तो छुटा ही देगा.वहीँ इस फैसले को देखकर एक आम नागरिक ये बात तो गर्व से कह सकता है की"भारत के फैसलों में देर हैंलेकिन अंधेर नहीं"।

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