Friday, October 29, 2010

जाने कितने राज इस सीने में दबाये जा रहे हैं,
फिर भी ऐ जिंदगी तुझे जिए जा रहे हैं,
मुमकिन तो लगता नहीं संभल पाना फिर से ,
कागज़ और कलम से खुद को बयां क्किते जा रहे हैं,
न जाने कितने राज सीने में दबाये जा रहे हैं,
साथ न किसी यार का दर्द न किसी प्यार का
दिले दहशत नहीं छोड़ने पर अपने घर-बार का,
जाने क्यूँ हम ये झूटी बातन किये जा रहे हैं,
नबा जाने कितने राज सीने में दबाये जा रहे हैं
खुद को न बान कर पाए कभी ,
लोगों की उम्मीदों पे न उतर पाए कभी,
लो उम्मीदों से खुद को अलग किये जा रहे हैं
न जाने कितने राज इस सीने में दबाये जा रहे हैं
पत्रकार बनाने की चाहत थी ,
मगर जब से सच्चाई जानी है,
सुनहरे बविश्य की बस अब कामना ही किये जा रहे हैं
हालत अपनी देख कर,
रहम से दिल भर आता है,
बस अबुस रहम को हताकर्खून की जगह दिए जा रहे हैं,
नाजाने कितने राज़ सीने दबाये जा रहे हैं......................


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