Saturday, December 28, 2013

मेरी प्रवृत्ति...

सच में स्वतंत्र रहने का मन करता है...मेरे जीवन में कई बार ऐसी घटना हुई है जब मैंने रिश्ते रुपी कई बंधन अपनी स्वतंत्रता के लिए कुर्बान कर दिए हैं...वो रिश्ते जो खुद मेरे बनाए हुए थे...वो रिश्ते जो लोगों के साथ मेरे विश्वास के चलते पनपे थे...लेकिन मेरी 'स्वतंत्रता प्रधान' प्रवृत्ति कई बार मेरी दुश्मन तो कई बार परम मित्र साबित होती है...मेरे साथ के लोग ये नहीं समझ पाते कि आखिर उनकी गलती क्या है...मैं उनसे क्यों नहीं बात करता...लेकिन ये मन बिना किसी से किसी भी तरीका का गिला-शिकवा किए एक अलग रास्ते पर निकल जाता है...जिससे लोगों को मैं पराया सा लगता हूं...उस रिश्ते की टूटन में दर्द मेरा दिल भी बराबर से झेलता है लेकिन मेरी आदत...ये आदत...कई बार इस बात को महसूस करता हूं कि कहीं ये आदत किसी दिन मेरे किसी अति प्रिय शख्स को मुझसे हमेशा के लिए अलग न कर दे...