Friday, May 13, 2011

गर्मियों में हाएएएएएए दम निकला जाएएएएएएएएएए……




(नोट: जिसके पास समय की कमी हो कृपया वही इन लिखे शब्दों से दो-चार हों अन्यथा उनके समय का सदुपयोग हो सकता है)
धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न पड़ जाए , एक प्रसिद्ध गायक द्वारा गाया गया ये गीत ऐसी चिलचिलाती गर्मी में याद आना लाज़मी है। लेकिन मज़ाक न करूं तो ऐसी गर्मी रानी ही नहीं राजा, रंक और प्रजा सहित अच्छे-अच्छों का रंग काला कर दे (हंसी आए तो कृपया रोकना मत )।यक़ीन कीजिए पारा अभी से 42 डिग्री पार है,,,जून का आलम क्या होगा।
हां यदि गर्मी के प्रकोप से बचना चाहते हैं तो जेब में प्याज लेकर घर से निकलिए,,अरे जेब में ही क्यों दोस्तों एक बोरी प्याज रोज़ाना घर से लेकर निकला करें,,लू तो बिल्कुल नहीं लगेगी,,हां बोरी उठाते-उठाते शरीर का कोई अंग काम करना बंद कर दे तो इसके ज़िम्मेदारी मैं नहीं लेता {ये पढ़कर अगर गुस्सा आए तो अपने संघणक (कम्प्यूटर) पर ज़ोर का वार करें,,ध्यान से टूटे न !},,,
कितने दूर,कितने पास,,दूर-दूर पास-पास ये गीत कितने लोगों ने सुना है,,सभी ने,पक्का न (माफ़ करना मैंने नहीं सुना है, बाद में मुझे देख लेना) , लेकिन सच कहूं तो ये गाना मुझे कितनी धूप, कितनी प्यास,,धूप-धूप,,प्यास-प्यास सुनाई में आने लगा है।
घर से बाहर निकलते ही सूर्यदेव कुछ इस तरह का प्रहार कर रहे हैं,,जैसे वह अपनी सारी ऊर्जा हमें देकर ही छोड़ेंगे ,यहां मैं बड़ी-बड़ी कार में बैठने वाले लोगों की बात नहीं कर रहा,,क्योंकि बचपन से मेरा और श्रीमान सूर्यदेव का आमना-सामना बिना किसी ऐसे शीशों के होता आया है, जो कि विशेष चारपहिया वाहन में पाए जाते हैं। ख़ैर ऐ मेरे हमदर्दों यदि आप भी श्रीमान सूर्यदेव के लिए कोई विरोधाभास करते हों तो बेझिझक होकर अपनी शिकायत ufyegarmi.haiahi@suryadev .com पर दर्ज करा सकते हैं यकीन कीजिए सर्दियों के आने तक आप की दुविधा को ज़रूर हल कर दिया जाएगा,,,,,,,,,
शुभ जीवन,,शब्बाख़ैर
आपका आज्ञाकारी शिष्य
सूर्यपुजारी

Saturday, May 7, 2011

अद्भुत, अविश्वसनीय,अमानवीय,मोहक,ईश्वर से उत्तम, प्रेरणादायक,विचारों से परे
कैसे भी,कितने भी शब्द नाकाफी हैं ममता की मूर्त को बयां करने के लिए
लेकिन क्या करूं,,आदत खराब है,, एक छोटी सी भेंट हम सभी बच्चों की तरफ से केवल और केवल इस कल्पनाशीलता से भरे शब्द मां के लिए
मां
जब कभी मैं अपनी मां के पास जाता हूं,
एक अद्भुत ऊर्जा का अनुभव करता हूं,
जो मन कभी भी शान्त नहीं बैठता,
उसे तकिये के साथ निन्द्रा में पाता हूं,

जब भी मैं अपनी मां के पास जाता हूं
कहीं जननी के रूप में ईश्वर तो नहीं,
मां के रूप में अवतार तो नहीं,
ध्यान से चेहरा देखने पर,
ऐसे ही दुविधायुक्त हो जाता हूं,

जब भी मैं मां के पास....
दुविधाओं की गर बात करूं तो,
ये मां से अक्सर दूर रहती हैं,
इसी बात का फ़ायदा उठाकर,
उनके आंचल में छुप जाता हूं,

जब भी मैं......
एक अजीब सी खुशबू,
एक अद्भुत अहसास,
सुन्दरता तो इतनी कि,
विश्वसुन्दरी को कम पाता हूं,
जब कभी मैं.........
प्यारे पाठकों सहित विश्व की सभी जननियों को समर्पित
स दर धन्यवाद